शुक्रवार, 7 अगस्त 2009

शुक्रवार, 31 जुलाई 2009

सब कुछ तो यहीं है जनाब , ज़रा आँखें तो खोलिए

समाज : मात्र तीन शब्दों का बना यह शब्द जाने क्या क्या प्रतिबिंब दिखाता है, जिसमे कभी इतिहास की पुनरा व्रत्ती है तो कभी वो भविष्य का प्रतिबिंब भी दिखा देता है . और वर्तमान मे तो ना जाने क्या क्या .............आते जाते आप जाने अंजाने पता नही समाज के किन पहलुओं से परिचित होते हैं...............कभी यह रोमांचित करने वाला कभी सहमा देने वाला तो कभी आपको बहुत ही बेबस कर देने वाला. आप कभी अपने आप को बहुत ही गौरवान्वित महसूस करते है इस समाज मे होने के लिए और कभी आप ये सोचते है कि अबशायद चलने का वक़्त हो गया है....पर इन्ही विचारों को बदलने के लिए चलिए एक शुरुआत करते है ....जिसमे आप भी शामिल होंगे और हम भी ......जिसमे आप रोमांचित भी होंगे और प्रफुल्लित भी होंगे डरेंगे भी और सहमेंगे भी....और जब भी किसी मुसीबत मे होंगे तो उसका समाधान भी यहीं होगा .......पर आप ये कभी नही कहेंगे की अब चलने का वक़्त हो गया ..बल्कि ये कहंगे की .......जोश अंदर मे